रविवार, ११ अक्तूबर २००९

वाटिका - अक्तूबर 2009


वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की कविताएँ और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र शजर, अनिल मीत और शेरजंग गर्ग की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- समकालीन हिंदी कविता में अपनी विशिष्ट और पृथक पहचान रखने वाली सुपरिचित कवयित्री कात्यायनी की स्त्री से जुड़ी दस चुनिंदा कविताएँ…

दस कविताएं - कात्यायनी

॥एक॥
इस स्त्री से डरो

यह स्त्री
सब कुछ जानती है
पिंजरे के बारे में
जाल के बारे में
यंत्रणागृहों के बारे में।

उससे पूछो
पिंजरे के बारे में पूछो
वह बताती है
नीले अनन्त विस्तार में
उड़ने के
रोमांच के बारे में।

जाल के बारे में पूछने पर
गहरे समुद्र में
खो जाने के
सपने के बारे में
बातें करने लगती है।

यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही
गाने लगती है
प्यार के बारे में एक गीत।

रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियाँ
इन्हें समझो,
इस स्त्री से डरो।
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॥दो॥
भाषा में छिप जाना स्त्री का

न जाने क्या सूझा
एक दिन स्त्री को
खेल-खेल में भागती हुई
भाषा में समा गई
छिपकर बैठ गई।

उस दिन
तानाशाहों को
नींद नहीं आई रात भर।

उस दिन
खेल न सके कविगण
अग्निपिण्ड के मानिंद
तपते शब्दों से।

भाषा चुप रही सारी रात।

रुद्रवीणा पर
कोई प्रचण्ड राग बजता रहा।

केवल बच्चे
निर्भीक
गलियों में खेलते रहे।
0
॥तीन॥
स्त्री का सोचना एकान्त में

चैन की एक साँस
लेने के लिए स्त्री
अपने एकान्त को बुलाती है।

एकान्त को छूती है स्त्री
संवाद करती है उससे।

जीती है
पीती है उसको चुपचाप।

एक दिन
वह कुछ नहीं कहती अपने एकान्त से
कोई भी कोशिश नहीं करती
दुख बाँटने की
बस, सोचती है।

वह सोचती है
एकान्त में
नतीजे तक पहुँचने से पहले ही
ख़तरनाक घोषित कर दी जाती है !
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॥चार॥
देह न होना

देह नहीं होती है
एक दिन स्त्री
और उलट-पुलट जाती है
सारी दुनिया
अचानक !
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॥पाँच॥
हॉकी खेलती लड़कियाँ

आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हॉकी।
खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल
खेल रही हैं हॉकी
कोई डर नहीं।

बॉल के साथ दौड़ती हुई
हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से
मूसल की धमक से
दौड़ती हुई
बहुत दूर आ जाती हैं।

वहाँ इंतज़ार कर रहे हैं
उन्हें देखने आए हुए वर पक्ष के लोग
वहाँ अम्मा बैठी राह तकती है
कि बेटियाँ आएं तो
संतोषी माता की कथा सुनाएं
और
वे अपना व्रत तोड़ें।

वहाँ बाबूजी प्रतीक्षा कर रहे हैं
दफ्तर से लौटकर
पकौड़ी और चाय की
वहाँ भाई घूम-घूम कर लौट आ रहा है
चौराहे से
जहाँ खड़े हैं मुहल्ले के शोहदे
रोज़ की तरह
लड़कियाँ हैं कि हॉकी खेल रही हैं।

लड़कियाँ
पेनाल्टी कार्नर मार रही हैं
लड़कियाँ
पास दे रही हैं
लड़कियाँ
'गो...ल- गो...ल' चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं।
लड़कियाँ
एक-दूसरे पर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
और हँस रही हैं।

लड़कियाँ फाउल खेल रही हैं
लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है
और वे हँस रही हैं
कि यह ज़िन्दगी नहीं है
-इस बात से निश्चिंत हैं लड़कियाँ
हँस रही हैं
रेफ़री की चेतावनी पर।

लड़कियाँ
बारिश के बाद की
नम घास पर फिसल रही हैं
और गिर रही हैं
और उठ रही हैं

वे लहरा रही हैं
चमक रही हैं
और मैदान के अलग-अलग मोर्चों में
रह-रहकर उमड़-घुमड़ रही हैं।

वे चीख़ रही हैं
सीटी मार रही हैं
और बिना रुके भाग रही हैं
एक छोर से दूसरे छोर तक।

उनकी पुष्ट टांगें चमक रही हैं
नृत्य की लयबद्ध गति के साथ
और लड़कियाँ हैं कि निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हैं
बिना यह सोचे कि
मुँह दिखाई की रस्म करते समय
सास क्या सोचेगी।

इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निस्संकोच-निर्भीक
दौड़ती-भागती और हँसती रहतीं
इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें।

पर शाम है कि होगी ही
रेफ़री है कि बाज नहीं आएगा
सीटी बजाने से
और स्टिक लटकाये हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की
तैयारी करती लड़कियाँ लौटेंगी घर।

अगर ऐसा न हो तो
समय रुक जाएगा
इन्द्र-मरुत-वरुण सब कुपित हो जाएंगे
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे
देखने आए वर पक्ष के लोग
पैर पटकते चले जाएंगे
बाबूजी घुस आएंगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा
और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी-
'किस घड़ी में पैदा किया था
ऐसी कुलच्छनी बेटी को!'
बाबूजी चीखेंगे-
'सब तुम्हारा बिगाड़ा हुआ है !'
घर फिर एक अँधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएंगे
लड़कियाँ घूरेंगी अँधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुईं
अम्मा की लम्बी साँसें सुनतीं
इंतज़ार करती हुईं
कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएंगी
सो जाएंगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बॉल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में
पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएंगी
और 'गोल-गोल' चिल्लाती हुईं
एक दूसरे को चूमती हुईं
लिपटकर धरती पर गिर जाएंगी !
0
॥छह॥
सात भाइयों के बीच चम्पा

सात भाइयों के बीच
चम्पा सयानी हुई।

बाँस की टहनी-सी लचक वाली
बाप की छाती पर साँप-सी लोटती
सपनों में काली छाया-सी डोलती
सात भाइयों के बीच
चम्पा सयानी हुई।

ओखल में धान के साथ
कूट दी गई
भूसी के साथ कूड़े पर
फेंक दी गई
वहाँ अमरबेल बन कर उगी।

झरबेरी के साथ कँटीली झाड़ों के बीच
चम्पा अमरबेल बन सयानी हुई
फिर से घर में आ धमकी।

सात भाइयों के बीच सयानी चम्पा
एक दिन घर की छत से
लटकती पाई गई
तालाब में जलकुम्भी के जालों के बीच
दबा दी गई
वहाँ एक नीलकमल उग आया।

जलकुम्भी के जालों से ऊपर उठकर
चम्पा फिर घर आ गई
देवता पर चढ़ाई गई
मुरझाने पर मसल कर फेंक दी गई,
जलायी गई
उसकी राख बिखेर दी गई
पूरे गाँव में।

रात को बारिश हुई झमड़कर।

अगले ही दिन
हर दरवाज़े के बाहर
नागफनी के बीहड़ घेरों के बीच
निर्भय-निस्संग चम्पा
मुस्कुराती पाई गई।
0
॥सात॥
प्रार्थना

प्रभु !
मुझे गौरवान्वित होने के लिए
सच बोलने का मौक़ा दो
परोपकार करने का
स्वर्णिम अवसर दो प्रभु मुझे।

भोजन दो प्रभु, ताकि मैं
तुम्हारी भक्ति करने के लिए
जीवित रह सकूँ।
मेरे दरवाज़े पर थोड़े से ग़रीबों को
भेज दो
मैं भूखों को भोजन कराना चाहता हूँ।

प्रभु, मुझे दान करने के लिए
सोने की गिन्नियाँ दो।
प्रभु, मुझे वफ़ादार पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र,
लायक़ भाई और शरीफ़ पड़ोसी दो।

प्रभु, मुझे इहलोक में
सुखी जीवन दो ताकि बुढ़ापे में
परलोक की चिन्ता कर सकूँ।

प्रभु,
मेरी आत्मा प्रायश्चित करने के लिए
तड़प रही है
मुझे पाप करने के लिए
एक औरत दो !
0
॥आठ॥
नहीं हो सकता तेरा भला

बेवकूफ़ जाहिल औरत !
कैसे कोई करेगा तेरा भला?
अमृता शेरगिल का तूने
नाम तक नहीं सुना
बमुश्किल तमाम बस इतना ही
जान सकी हो कि
इन्दिरा गाँधी इस मुल्क़ की रानी थीं।
(फिर भी तो तुम्हारे भीतर कोई प्रेरणा का संचार नहीं होता)

रह गई तू निपट गँवार की गँवार।

पी.टी. उषा को तो जानती तक नहीं
मार्गरेट अल्वा एक अजूबा है
तुम्हारे लिए।
'क ख ग घ' आता नहीं
'मानुषी' कैसे पढ़ेगी भला!
कैसे होगा तुम्हारा भला-
मैं तो परेशान हो उठता हूँ
आज़िज़ आ गया हूँ मैं तुमसे।

क्या करूँ मैं तुम्हारा?

हे ईश्वर !
मुझे ऐसी औरत क्यों नहीं दी
जिसका कुछ तो भला किया जा सकता
यह औरत तो बस भात राँध सकती है
और बच्चे जन सकती है
इसे भला कैसे मुक्त किया जा सकता है?
0
॥नौ॥
अपराजिता

(सृष्टिकर्ता ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, ज़ेवर, अपवित्र इच्छाएँ, ईर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया --'मनु' )
उन्होंने यही
सिर्फ़ यही दिया हमें
अपनी वहशी वासनाओं की तृप्ति के लिए
दिया एक बिस्तर
जीवन घिसने के लिए, राख होते रहने के लिए
चौका-बरतन करने के लिए बस एक घर
समय-समय पर
नुमाइश के लिए गहने पहनाए
और हमारी आत्मा को पराजित करने के लिए
लाद दिया उस पर
तमाम अपवित्र इच्छाओं और दुष्कर्मों का भार।

पर नहीं कर सके पराजित वे
हमारी अजेय आत्मा को
उनके उत्तराधिकारी
और फिर उनके उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारी भी
नहीं पराजित कर सके जिस तरह
मानवता की अमर-अजय आत्मा को
उसी तरह नहीं पराजित कर सके वे
हमारी अजेय आत्मा को
आज भी वह संघर्षरत है
नित-निरंतर
उनके साथ
जिनके पास खोने को सिर्फ़ ज़ंजीरें ही हैं
बिल्कुल हमारी ही तरह !
0
॥दस॥
माँ के लिए एक कविता

वहाँ
अभी भी सन्नाटा गाता रहता है
उदास,फीकी धुनों पर
पराजित आत्माओं का गीत।

पीली धूप में
पत्ते झड़ते रहते हैं
जूठे बरतन इन्तज़ार करते रहते हैं
नल के नीचे
शाम होने का।

एक जोड़ी घिसी हुई चप्पलें
थकी-हारी दाख़िल होती हैं घर में
दिन भर की पूरी थकान
शरीर से उतरकर पसर जाती है
घर-आँगन में।

इन्तज़ार आँखों में उतर आता है
उम्मीदों की तरह
कि छोटी-सी लहर की तरह
एक बस्ता उछलता हुआ घर आता है
बरतन में ढँका ठण्डा खाना
मुस्कराने लगता है।

पार्श्व में गूँजता
उदासी का संगीत मद्धिम पड़ जाता है।

दाह-संस्कार से लौटे पाँवों की तरह
आतंक घर में दाख़िल होता है
शाम के अँधेरे के साथ
बल्ब की बीमार रौशनी में
दफ्तर के काग़ज़ात खोलकर बैठ जाता है।

बस्ता बैठा हुआ
सबक याद करने लगता है
पुन: गूँजने लगता है सन्नाटे का वही संगीत
धीरे-धीरे खर्राटों में तब्दील होता हुआ।

एक थकी हुई प्रतीक्षा
बरामदे में निरुद्देश्य घूमती है
चौका-बरतन के काम निबटाने के बाद।

सन्नाटा गाता रहता है
एक उदास बूढ़े भजन की तरह
पराजित आत्माओं का गीत।

तलघर में सफ़ेद बौने राक्षस
सिसकारी भरते हैं
दीवार पर लटकी तस्वीर के पीछे
घोंसला बनाए हुए कबूतर
पंख फड़फड़ाते हैं।

दिन भर के थके हुए हाथ
घूमते हैं आलस भाव से
एक नन्हें शरीर पर
भय को धूल की तरह पोंछते हुए।

प्यार भरी उनींदी -सी लोरी
उम्मीदें गाने लगती है।

जीवन सुगबुगाता है
करवट बदलकर
गले में बाँहें डाल निश्चिन्त हो जाता है।

पार्श्व में गूँजता रहता है
पराजित आत्माओं का वहीं गीत
सपनों पर कालिख़ की तरह छाता हुआ।

चूल्हे की राख की परतों के बीच से
चिंगारियाँ झाँकती रहती हैं
हल्की-सी लाल रोशनी बिखेरती हुईं।
00
जन्म : 7 मई 1959
शिक्षा : एम.ए., एम.फिल.(हिन्दी)
विगत 24 वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन। लगभग सात वर्षों तक 'नवभारत टाइम्स' और 'स्वतंत्र भारत' की संवाददाता के रूप में भी काम किया। संप्रति : स्वतंत्र लेखन।
कविताएँ हिन्दी की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कुछ कविताएँ अंग्रेजी, पंजाबी, मराठी, गुजराती में अनुदित-प्रकाशित। आधा दर्जन कहानियाँ प्रकाशित।
चेहरों पर आँच, सात भाइयों के बीच चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता, फुटपाथ पर कुर्सी, राख अँधेरे की बारिश में(सभी कविता संकलन), दुर्ग द्वार पर दस्तक (स्त्री-प्रश्न विषयक निबन्धों का संकलन), षडयंत्ररत् मृतात्माओं के बीच(साम्प्रदायिक, फासीवाद, बुद्धिजीवी प्रश्न और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर केन्द्रित निबन्धों का संकलन), कुछ जीवन्त, कुछ ज्वलन्त(समाज, संस्कृति और साहित्य पर केन्द्रित निबन्धों का संकलन), प्रेम, परम्परा और विद्रोह( शोधपरक निबन्ध) प्रकाशित।
समकालीन भारतीय स्त्री कवियों के पेंगुइन द्वारा प्रकाशित संकलन 'इन देयर ओन वॉयस' में कविताएँ शामिल।
क्रान्तिकारी वामपंथी राजनीति से अनुप्रमाणित सामाजिक सक्रियता, सांस्कृतिक मोर्चे व नारी मोर्चे के साथ साथ मज़दूर मोर्चे पर भी सक्रिय।
सम्पर्क : डी-68, निराला नगर, लखनऊ-226020
ई-मेल :katyayani.lko@gmail.com
दूरभाष : 09936650658

रविवार, २ अगस्त २००९

वाटिका - अगस्त 2009


वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की कविताएँ और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र शजर और अनिल मीत की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- हिंदी के जाने-माने कवि-ग़ज़लकार डा. शेरजंग गर्ग की दस चुनिंदा ग़ज़लें।

दस ग़ज़लें – डा. शेरजंग गर्ग
ग़ज़लों के साथ सभी चित्र : अवधेश मिश्र

न देखो पीर उर की, पर अधर की प्यास तो देखो
निहारो मत दिये को, पर शलभ की लाश तो देखो

न कहना फिर तड़प का कुछ असर होता नहीं जग में,
धरा के ताप पर रोता हुआ आकाश तो देखो

सही है, रिक्त हूँ मैं ज़िन्दगी की मुस्कराहट से,
व्यथाओं ने दिया है जो मधुर उल्लास तो देखो

इधर उपवन हुआ वीरान है, यह मानता हूँ मैं
उधर अंगड़ाइयाँ लेता हुआ मधुमास तो देखो

नहीं मालूम तुमको खुद तुम्हारे ईश की सूरत
मनुज की भावना का यह सबल उपहास तो देखो

रुपहली रात में माना व्यथित आँखें बरसती हैं
घनी काली घटाओं में तड़ित का हास तो देखो

न मापो ज़िन्दगी में दर्द की गहराइयों को तुम
हृदय के अंक में पलता हुआ विश्वास तो देखो।


ये जो कुछ ज़ख्म खिले हैं यारो
दर्द के लालकिले हैं यारो

दुश्मनों में तो कोई दोस्त नहीं
किसलिए शिकवे-गिले हैं यारो

बात करने को जुबाँ है आज़ाद
होंठ से होंठ सिले हैं यारो

हम ज़मीनों पर टिके हैं अपनी
वो ज़मीरों से हिले हैं यारो

बस्तियाँ दिल की बसी हैं जिनमें
चन्द सपनों के ज़िले हैं यारो

वाह! क्या बात है, क्या सादगी-सच्चाई है
आज हम हमसे मिले हैं यारो।

ज़िन्दगी-सी यों ज़िन्दगी भी नहीं
किन्तु मंजूर ख़ुदकुशी भी नहीं

सिलसिलेवार मौत जीते हैं
ज़िन्दगी की घड़ी टली भी नहीं

दिल की दुनिया उजाड़ दी खुद ही
गो कि फ़ितरत में दिल्लगी भी नहीं

बेख़ुदी का मलाल कौन करे
काम आई यहाँ ख़ुदी भी नहीं

कट गई उम्र, उठ गई महफ़िल
बात ईमान की चली भी नहीं

प्रश्न उठता है मैं हूँ कहाँ
और उत्तर में मैं कहीं भी नहीं।


मंजिलों की नज़र में रहना है
बस निरंतर सफ़र में रहना है

काश, कुछ बाल बाल बच जाये
हादसों के शहर में रहना है

बेरुखी बेदिली का मौसम है
हाँ, हमें काँचघर में रहना है

लोग जीने न दें करीने से
यह हुनर तो हुनर में रहना है

कुछ हमारी ख़बर नहीं उनको
जिनको केवल ख़बर में रहना है

कब तलक देखिए ज़माने को
शायरी के असर में रहना है।

चन्द सिक्कों की खुराफ़ात से क्या होना है ?
आइये, सोच लें किस बात से क्या होना है ?

पर फ़कत बात से, जज्बात से क्या होना है,
कुछ फ़रिश्तों की इनायात से क्या होना है ?

रोज़ करते हैं दुआ लोग, सुबह भी होगी,
चाँद-तारों से भरी रात से क्या होना है ?

प्यार की एक-दो बूँदों की छलक काफ़ी है,
तोप -बारूद की बरसात से क्या होना है ?

आदमी बन चुका इंसानियत की पैरोडी,
दोस्तो, ऐसे तजुर्बात से क्या होना है ?

दर्द को पोसिये, फिर ठोस ज़मी पर रखिये,
सर्द-से ख़ाम ख़यालात से क्या होना है ?

अपने अहसान किसी और की जेबों में भरो,
हम फ़कीरों का इस ख़ैरात से क्या होना है ?


ख़ुश हुए मार कर ज़मीरों को
फिर चले लूटने फ़कीरों को

आज रांझे भी क़त्ल में शामिल
शर्म आने लगी है हीरों को

रास्ते साफ़ हैं, बढ़ो बेख़ौफ़
कैसे समझायें राहगीरों को ?

वे निहत्थों पे वार करते हैं
देखिए इस सदी के वीरों को

दिल में नफ़रत की धूल गर्द जमीं
हम सजाते रहे शरीरों को

कृष्ण के देश में दुशासन जन
कब तलक यों हरेंगे चीरों को

चलती चक्की को देखकर हँसते
हाय, क्या हो गया कबीरों को ?

लूट, नफ़रत, तनातनी, हिंसा
कब मिटाओगे इन लकीरों को ?


चोटियों में कहाँ गहराई है
सिर्फ़ ऊँचाई ही ऊँचाई है

जो भी जितनी बड़ी सच्चाई है
उतनी ज्यादा गई झुठलाई है

कब फ़कीरों ने तौर बदले हैं
कब वज़ीरों से मात खाई है

मंज़िलें खोजती हैं जंगल में
कितनी मासूम रहनुमाई है

अब यहाँ सिर्फ़ तमाशे होंगे
हर कोई मुफ्त तमाशाई है

आप जिसको वफ़ा समझते हैं
वो किसी ख्वाब की परछाई है

दोस्तो, दूरियों को दूर करो
चीख़कर कह रही तनहाई है।


काँच निर्मित घरों के क्या कहने
भुरभुरे पत्थरों के क्या कहने

झुक गए तानने के मौक़े पर
ऊँचे-ऊँचे सरों के क्या कहने

जिनके होंठों पे सिर्फ़ अफ़वाहें
ऐसे हमलावरों के क्या कहने

रहज़नी में कमाल हासिल है
रहनुमा रहबरों के क्या कहने

आदमी है गुलाम सिक्कों का
उठती-गिरती दरों के क्या कहने

बेच कर मुल्क मुस्कराते हैं
क़ौम के मसख़रों के क्या कहने।

आप कहने को बहुत ज्यादा बड़े हैं
असलियत यह है मचानों पर खड़े हैं

ख़ास कंधा, दास चंदा, रास धंधा,
एक अंधे दौर के सिर पर चढ़े हैं

कीजिए झट कीजिए इनकी नुमाइश,
आपके आदर्श फ्रेमों में जड़े हैं

कोई सच्चाई यहाँ टिकती नहीं है
क्रांति के वक्तव्य क्या चिकने घड़े हैं?

हर किसी में दम नहीं इनको निभाये,
आदमीयत के नियम ख़ासे कड़े हैं

वो लड़ेंगे क्या कि जो ख़ुद पर फ़िदा हैं,
हम लडेंगे, हम खुदाओं से लड़े हैं।

१०

नर्म रह कर न यहाँ बैठना-चलना होगा
वक्त को सख्त तरीकों से बदलना होगा

प्यार की बात अँधेरों में भटक सकती है
अब चिरागों को बहुत देर तक जलना होगा

पर सँभलना तो ज़रूरी है, सँभल जाएँगे
पहले खूँखार इरादों को सँभलना होगा

हम हदों में रहे बेहद, यह सही है लेकिन
अपनी सरहद पे मगर रोज़ टहलना होगा

जो हमारे लिए साज़िश में रचे दुनिया ने
उन खिलौनों से नहीं दिल का बहलना होगा

इक ज़रूरत है मेरी क़ौम का ज़िन्दा रहना
मौत के खूफ़िया पंजों से निकलना होगा

देश के प्रेम का हम जाम पियें, खूब पियें,
जलने वालों को फक़त हाथ ही मलना होगा।
00

डा. शेरजंग गर्ग हिंदी के जाने-माने कवि, ग़ज़लकार व व्यंग्यकार हैं। ग़ज़ल की सदियों पुरानी परम्परा को हिंदी से जोड़ने में हिंदी के जिन शीर्ष कवियों का उल्लेखनीय योगदान रहा है, उनमें डा. शेरजंग गर्ग एक प्रमुख नाम माना जाता है। इनकी ग़ज़लें अपने समय और समाज की नब्ज़ पर हाथ रखती हैं इसलिए इनके अनेक शे'र ज़बान पर बहुत आसानी से चढ़ जाते हैं। डा. गर्ग अपने व्यंग्यों और बाल रचनाओं के लिए भी बखूबी जाने जाते हैं। 'चन्द ताज़ा गुलाब तेरे नाम' और 'क्या हो गया कबीरों को' इनके बहु चर्चित ग़ज़ल संग्रह हैं। 'बाज़ार से गुजरा हूँ' और 'दौरा अन्तर्यामी का'(व्यंग्य), तथा 'गुलाबों की बस्ती', 'शरारत का मौसम', 'सुमन बाल गीत', 'अक्षर गीत', 'भालू की हड़ताल'(बाल साहित्य) आदि पर इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। इसके अतिरिक्त गीत व ग़ज़ल विधा पर अनेक पुस्तकों का संपादन कार्य भी किया है।
सम्पर्क : एच-43(भूतल), साउथ एक्सटेंशन (पार्ट-2), नई दिल्ली-110049, दूरभाष : 9811993230

शुक्रवार, १९ जून २००९

वाटिका - जून 2009

वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की कविताएँ और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव और सुरेन्द्र शजर की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- एक और महत्वपूर्ण युवा शायर अनिल मीत की दस चुनिंदा ग़ज़लें।

दस ग़ज़लें – अनिल मीत
ग़ज़लों के साथ सभी चित्र : अवधेश मिश्र

1

जिसकी जितनी उड़ान बाकी है
उतना ही आसमान बाकी है

राज़ आँखों से खुल गया है मगर
दिल में अब भी गुमान बाकी है

मेरे हक में ही फैसला होगा
ये अभी इम्तिहान बाकी है

वार तीरों के सब गए ख़ाली
हाथ में बस कमान बाकी है

सारी दुनिया तो देख ली हमने
इक मुकम्मल जहान बाकी है

अब तो आजा कि मेरी आँखों में
और थोड़ी-सी जान बाकी है

बात करता रहेगा हक की 'मीत'
जब तलक तन में जान बाकी है।

2

फ़ासला कम अगर नहीं होता
फ़ैसला उम्र भर नहीं होता

कौन सुनता मेरी कहानी को
ज़िक्र तेरा अगर नहीं होता

बात तर्के-वफ़ा के बाद करूँ
हौसला अब मगर नहीं होता

कैसे समझाऊँ मैं तुझे ऐ दिल
सामरी¹ हर शजर नहीं होता

तेरी रहमत का जिसपे साया हो
खुद से वो बेख़बर नहीं होता

कौन कहता है ज़िन्दगानी का
रास्ता पुरख़तर नहीं होता

'मीत' मिलते हैं राहबर तो बहुत
पर कोई हमसफ़र नहीं होता।
1- फल देनेवाला


रुकना इसकी रीत नहीं है
वक्त क़िसी का मीत नहीं है

जबसे तन्हा छोड़ गए वो
जीवन में संगीत नहीं है

माना छल से जीत गए तुम
जीत मगर ये जीत नहीं है

जिसको सुनकर झूम उठे दिल
ऐसा कोई गीत नहीं है

जाने किसका श्राप फला है
सपनों में भी 'मीत' नहीं है।


सिर्फ़ हैरत से ज़माना देखता रह जाएगा
बाद मरने के कहाँ किसका पता रह जाएगा

अपने अपने हौसले की बात सब करते रहे
ये मगर किसको पता था सब धरा रह जाएगा

तुम सियासत को हसीं सपना बना लोगे अगर
फिर तुम्हें जो भी दिखेगा क्या नया रह जाएगा

मंज़िलों की जुस्तजू में बढ़ रहा है हर कोई
मंज़िलें गर मिल गईं तो बाकी क्या रह जाएगा

'मीत' जब पहचान लोगे दर्द दिल के घाव का
फिर कहाँ दोनों में कोई फ़ासला रह जाएगा।


दिल मेरा तेरी रहगुज़र में नहीं
फ़ासला अब मेरी नज़र में नहीं

मेरा साया मेरी नज़र में नहीं
कोई साथी भी अब सफ़र में नहीं

ये मुकद्दर मिले, मिले न मिले
चाह मंज़िल की किस बशर में नहीं

दिन ढला है कि रात बाकी है
ताब इतनी भी अब नज़र में नहीं

जाने किस सम्त बढ़ रहे हैं कदम
होश इतना भी अब सफ़र में नहीं

खेलता हूँ हर एक मुश्किल से
हौसला क्या मेरे जिगर में नहीं

ढ़ूँढ़ता फिर रहा हूँ मुद्दत से
'मीत' मिलता किसी नगर में नहीं।


मुहब्बत में अब रंग आने लगा है
कि वो मुझसे नज़रें चुराने लगा है

यक़ीकन यक़ीं डगमगाने लगा है
मुझे फिर से वो आज़माने लगा है

जो वादा किया है निभा न सकोगे
ये चेहरा तुम्हारा बताने लगा है

जिसे लाके साहिल पे छोड़ा था हमने
वो तूफां सर को उठाने लगा है

खुदा जाने क्या देखा दिल ने अचानक
वे क्यों छोड़कर मुझको जाने लगा है

जिसे नाज़ कल तक रहा दोस्ती पर
वही दुश्मनी अब निभाने लगा है

मेरे 'मीत' मुझ पर भरोसा नहीं क्या
जो तू राज़ अपना छुपाने लगा है।


फिर उसने आज मुझको हैरान कर दिया है
मेरे ही घर में मुझको मेहमान कर दिया है

पहले नज़र मिलेगी फिर वारदात होगी
क़ातिल ने आज खुलकर ऐलान कर दिया है

नज़रों से दूर मेरी जिसका असर न होगा
इतना हसीन मुझ पर एहसान कर दिया है

मरहम भी अब लगाऊँ तो फैज़ कुछ न होगा
ज़ख्मी हर एक दिल का अरमान कर दिया है

तेरी हयात बन कर दुनिया में कौन आया
दिल किसने 'मीत' तुझपर कुर्बान कर दिया है।


हादसा गर हुआ नहीं होता
आदमी वो बुरा नहीं होता

आदमी आदमी से डरता है
ख़ौफ़ दिल से जुदा नहीं होता

कब किधर से कहाँ को जाना है
आदमी को पता नहीं होता

कोई इमदाद ही नहीं करता
मेहरबाँ गर ख़ुदा नहीं होता

काश तेरी परेशां ज़ुल्फ़ों को
शाने तक ने छुआ नहीं होता

जो जुबाँ से तुम्हारी निकला था
काश, मैंने सुना नहीं होता

कौन जाने नज़र से उनकी 'मीत'
दूर क्यों आईना नहीं होता।


मेरी बानी ख़ुद बोलेगी आज नहीं तो कल
ख़ामोशी भी लब खोलेगी आज नहीं तो कल

अलसायी आँखें खोलेगी आज नहीं तो कल
मन की कोयलिया बोलेगी आज नहीं तो कल

हरदम डरकर रहना इसको कहाँ गवारा है
हिम्मत अपने पर तौलेगी आज नहीं तो कल

अपनेपन की तर्ज़ तुम्हारी मेरे जीवन में
रंग मुहब्बत का घोलेगी आज नहीं तो कल

'मीत' तुझे आवारा कहने वाली ये दुनिया
तेरे पीछे खुद हो लेगी आज नहीं तो कल।

१०

वो यक़ीनन ही हर एक दिल में खुशी भर जाएगा
जो अँधेरी बस्तियों में रौशनी कर जाएगा

दौर ज़ुल्मों का अगर रोका गया न दोस्तो
आदमी ख़ुद आदमी के नाम से डर जाएगा

शर्म यूँ नीलाम होने आ गई बाज़ार में
शर्म गर बाकी रही तो आदमी मर जाएगा

लूटता फिरता है सबको तीरगी के नाम पर
देखना वो रौशनी के नाम से डर जाएगा

दिल दुखाना, आह भरना और रोना दोस्तो
'मीत' सा आशिक जहाँ में जीते जी मर जाएगा।
00

अनिल मीत
जन्म : 6 मार्च 1962
शिक्षा : बी काम(पास), दिल्ली विश्वविद्यालय
संपादन : ‘हस्ताक्षर समय के वक्ष पर’, ‘क्षितिज की दहलीज़ पर’।
संकलित : ‘अनुभूति से अभिव्यक्ति तक’, ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’, ‘परिचय के स्वर’ आदि।
अन्य : अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानियाँ और ग़ज़लें प्रकाशित। मंचों, गोष्ठियों में काव्यपाठ, आकाशवाणी के विभिन्न चैनलों से कविता पाठ एवं वार्ता आदि का प्रसारण, परिचय साहित्य परिषद् में महासचिव के रूप में कार्यरत रहकर मासिक गोष्ठियों का संचालन एवं संयोजन।
संप्रति : पंजाब नेशनल बैंक के प्रधान कार्यालय, नई दिल्ली में कार्यरत।
संपर्क : बी-43 ए, शिवाजी एन्क्लेव, शिवाजी कालेज के पीछे, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली-110027
फोन : 98101-46454, 98185-55511

गुरुवार, १६ अप्रैल २००९

वाटिका - अप्रैल 2009

वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की कविताएँ और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक और आलोक श्रीवास्तव की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- उर्दू-हिन्दी के एक और महत्वपूर्ण शायर सुरेन्द्र शजर की दस ग़ज़लें। यों तो सुरेन्द्र शजर की ग़ज़लें कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में निरंतर सुनने को मिलती रही हैं और अच्छी शायरी के क़द्रदानों द्वारा सराही भी जाती रही हैं, लेकिन वर्ष 1992 और 2005 में प्रकाशित उनके ग़ज़ल संग्रह “शजर-ए-सदा” और “रेत की दीवार” ने शायरी के सुधी पाठकों का ध्यान विशेष रूप से अपनी ओर खींचा । “वाटिका” में प्रस्तुत ये दस चुनिंदा ग़ज़लें उनके ग़ज़ल संग्रह “रेत की दीवार” से ही ली गई हैं।


दस ग़ज़लें – सुरेन्द्र शजर
ग़ज़लों के साथ सभी चित्र : अवधेश मिश्र

1

ख़ूने -दिल ख़ूने-जिगर पड़ता है पीना क्या करें
दिन-ब-दिन मुश्किल हुआ जाता है जीना क्या करें

लड़ के तूफ़ानों में हम अक्सर निकल आते तो हैं
साहिलों पर डूब जाता है सफ़ीना क्या करें

जब कोई हसरत नहीं रहती तो रहता है सुकूं
हसरतें दुश्वार कर देती हैं जीना क्या करें

इससे पहले कि गिला करते जफ़ा का उन से हम
आ गया है उनके माथे पर पसीना क्या करें

चार जानिब से मेरे दिल को है ग़म घेरे हुए
सैंकड़ों तूफ़ान हैं और इक सफ़ीना क्या करें

जो भी कुछ है पास अपने ऐश-ओ-इश्रत के लिए
ज़िन्दगानी के बख़ील हाथों से छीना क्या करें

उन को हम जैसे अदब वालों में भी रहकर 'शजर'
बात करने का नहीं आया क़रीना क्या करें

2

बहारों में कभी ऐसा नहीं था
शजर पे: एक भी पत्ता नहीं था

मेरा उससे कोई रिश्ता नहीं था
मगर ऐसा कभी लगता नहीं था

जिसे आदत नहीं थी महफ़िलों की
वही इक आदमी तन्हा नहीं था

सुकूं था, प्यार था दिल में वफ़ा थी
हमारे पास जब पैसा नहीं था

उसे अपने उसूलों से ग़रज़ थी
किसी से कोई समझौता नहीं था

तसव्वुर में हज़ारों मंज़िलें थीं
नज़र में एक भी रस्ता नहीं था

वो: मेरी खुश्क आँखें देखता था
उसे तूफ़ाँ का अन्दाज़ा नहीं था

इक आईना तो मेरे रूबरू था
'शजर' उस में कोई चेहरा नहीं था

3

दर्द को दिल के पास मत रखना
खुद को इतना उदास मत रखना

हर तरफ़ आग है हवाओें में
अपने घर में कपास मत रखना

देखिए ये: सफ़र है सहरा का
इस में दरिया की आस मत रखना

मुफ़लिसों की हंसी उड़ाए जो
तन पे: ऐसा लिबास मत रखना

शेख़ साहब नज़र से पीते हैं
उनके आगे गिलास मत रखना

या बिछड़ने न: दे मुझे, या फिर
मेरे मिलने की आस मत रखना

ख़ुद को पहचान भी न: पाओगे
आईने आस- पास मत रखना

तुम भटकते फिरोगे सहरा में
लब पे: इस दर्जा प्यास मत रखना

4


उनको अक्सर नज़र नहीं आते
टूटते घर नज़र नहीं आते

अब इन्हीं में गुज़र बसर कर लो
इनसे बेहतर नज़र नहीं आते

जब से पत्थर उठा लिए हम ने
कांच के घर नज़र नहीं आते

सर झुकाने की रस्म आम हुई
दार¹ पे: सर नज़र नहीं आते

अजनबी शह्र में कहां जाते
तुम हमें गर नज़र नहीं आते

जाने क्या ख़ौफ़ है कि शह्र के लोग
घर से बाहर नज़र नहीं आते

मंज़िलें सब को मिल रही हैं 'शजर'
जब से रहबर नज़र नहीं आते
1-फांसी

5


अगर हो रास्ता हमवार तो सफ़र कैसा
न: आए बीच में दीवार तो सफ़र कैसा

भटकना भी है ज़रूरी मुसाफ़िरों के लिए
मिलें जो रहनुमा हरबार तो सफ़र कैसा

मज़ा तो तब है वो: आंखें बिछाए बैठा हो
वो: मुन्तज़िर¹ न: हो उस पार तो सफ़र कैसा

ये: क्या कि चलते गए और आ गई मंज़िल
लगें न: ठोकरें दो चार तो सफ़र कैसा

बजा² है आरज़ू मंज़िल की भी 'शजर' लेकिन
चुभे न: पाँव में कुछ ख़ार तो सफ़र कैसा
1-प्रतीक्षा में 2-उचित, सच।


6


वो: शख्स जिस ने मुझे आईना दिखाया था
ख़ुद उसका चेहरा कब उसकी नज़र में आया था

किसी भी ख्वाब की ताबीर मेरे पास न: थी
वो: चन्द ख्वाब लिए मेरे पास आया था

खुली जो आंख तो दीवारें गिर गईं घर की
जो मैंने नींद की दहलीज़ पर बनाया था

जो मुश्किलों के सफ़र में था हमसफ़र मेरा
वो: काई और नहीं था मेरा ही साया था

तुम्हारे दिल ही से उतरी न: धूल रंजिश की
तुम्हारी बज्म में सब कुछ भुला के आया था

मेरे लबों पे: अभी तक है वो: हंसी साकित¹
तमाम ज़िन्दगी जिसने मुझे रूलाया था

सिवा अंधेरों के कुछ भी नहीं मिला जिससे
चिराग़ बन के मेरी ज़िन्दगी में आया था

जो दूसरों के घरों में लगाई थी मैंने
'शजर' उस आग ने मेरा भी घर जलाया था
1-ठहरी हुई।


7


तुमसे रिश्ता कायम रखना मुश्किल है
अंगारों में शबनम रखना मुश्किल है

कभी - कभी अच्छी लगती है तन्हाई
तन्हा खुद को हर दम रखना मुश्किल है

जिन से ताज़ा रहती हैं तेरी यादें
उन ज़ख्मों पे: मरहम रखना मुश्किल है

जब कोई अपनी हद से बढ़ जाता है
उन हालात में संयम रखना मुश्किल है

है आसान ग़मों को सहना मेरे लिए
और आँखों को पुरनम रखना मुश्किल है

वक्त क़े साथ बदल जाती है फ़ज़ा 'शजर'
बांध के कोई मौसम रखना मुश्किल है


8


कभी तो दोस्त कभी गैर मान लेता है
कहां कहां वो: मेरा इम्तेहान लेता है

जो हुक्मरां हो दलीलें नहीं सुना करते
जो उसके हक़ में हो उसका बयान लेता है

तो मिल के क्यों न उसे बेनक़ाब कर दें हम
जो अपने शह्र का अम्न-ओ-अमान लेता है

चलो निकल चलें बारिश के ख़त्म होने तक
हमारे क़दमों के कोई निशान लेता है

उसी के दर पे: चलें चल के बैठ जाएं 'शजर'
दिलों का हाल जो चेहरों से जान लेता है

9


दिल की दहलीज़ पर क़दम रक्खा
आ गए तुम मेरा भरम रक्खा

दोस्ती प्यार में बदल जाती
मिलना-जुलना तुम्हीं ने कम रक्खा

तेरे होठों के फूल ताज़ा रहें
अपनी आँखों को मैंने नम रक्खा

शायरी में निखार आएगा
तुमने जारी अगर सितम रक्खा

इस करम का तेरे जवाब नहीं
मेरे हिस्से में ग़म ही ग़म रक्खा

खुद-ब-खुद सहल¹ हो गई है 'शजर'
मैं ने जिस राह में क़दम रक्खा
1-सरल


10


ग़म को अश्कों में डुबोने दे मुझे
आज तू जी भर के रोने दे मुझे

या मुझे कांटों की आदत डाल दे
वरना मख़मल के बिछौने दे मुझे

तूने जब अपना बनाना ही नहीं
जिसका होता हूँ मैं होने दे मुझे

शुक्रिया ऐ मौत तेरा शुक्रिया
ज़िन्दगी का बोझ ढोने दे मुझे

मुझ को ताबीरों से कुछ मतलब नहीं
ख्वाब तू लेकिन सलोने दे मुझे

काट कर ये: फ़सल नफ़रत की 'शजर'
बीज कुछ उल्फ़त के बोने दे मुझे
00

सुरेन्द्र पाल सिंह 'शजर'
जन्म : 5 अक्तूबर 1958
आकाशवाण से अनुबंधित। 1986 में पहला मुशायरा कमानी ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में पढ़ा। देश के विभिन्न शहरों में मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भाग लिया। 2005 में विदेश में कराची शहर में आयोजित मुशायरों में शिरक्त की। जून 2008 में साउदी अरब (जेद्दा एवं रियाद) में हुए मुशायरों में भाग लिया। 1992 में पहली किताब ''शजर-ए-सदा''(ग़ज़ल संग्रह) हिन्दी और उर्दू में प्रकाशित। 2005 में दूसरी किताब ''रेत की दीवार'' (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हुई।

संप्रति - 1/158, सदर बाजार, दिल्ली कैन्ट-110010
फोन - 25693953, 9871557703

रविवार, २१ दिसम्बर २००८

वाटिका (दिसंबर 2008)

वाटिका – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की कविताएँ और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और रामकुमार कृषक की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि-ग़ज़लगो आलोक श्रीवास्तव की दस ग़ज़लें। यों तो आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़लें हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं और सराही जाती रही हैं, लेकिन राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 2007 में प्रकाशित उनकी पहली कविता पुस्तक “आमीन” ने कविता के सुधी पाठकों का ध्यान विशेष रूप से अपनी ओर खींचा है। “आमीन” में संकलित ग़ज़लों, नज्मों, गीतों और दोहों से गुजरते हुए यह बात बड़ी शिद्दत से पुख़्ता होती है कि यह शायर अपने समय के यथार्थ पर गहरी नज़र रखता है और अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति बेहद जागरूक है। यही नहीं, उसमें कविता के माध्यम से अपनी बात कहने की एक अलग और अनौखी प्रतिभा विद्यमान है। “वाटिका” में प्रस्तुत ये दस चुनिंदा ग़ज़लें उनकी कविता पुस्तक “आमीन” से ही ली गई हैं।



दस ग़ज़लें - आलोक श्रीवास्तव

एक

चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर- शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा

उसने ख़ुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा

घर में झीने-रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा

सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा

बाबूजी गुजरे घर में सारी चीज़ें तक़्सीम हुईं,तो-
मैं सबसे ख़ुशकिस्मत निकला, मेरे हिस्से आई अम्मा।

दो

घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबूजी

तीन मुहल्लों में उन जैसी क़द-काठी का कोई न था
अच्छे-ख़ासे, ऊँचे-पूरे, क़द्दावर थे बाबूजी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्माजी की सारी सजधज, सब जेवर थे बाबूज़ी

भीतर से ख़ालिस जज्बाती और ऊपर से ठेठ-पिता,
अलग, अनूठा, अनबूझा-सा, इक तेवर थे बाबूजी

कभी बड़ा सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी।

तीन

धड़कते, साँस लेते, रुकते, चलते, मैंने देखा है
कोई तो है जिसे अपने में पलते, मैंने देखा है

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन हैं
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते, मैंने देखा है

न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है
ख़ुद अपने आप को नींदों में चलते, मैंने देखा है

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें
तेरे सीने में अपना दिल मचलते, मैंने देखा है

बदल जाएगा सब कुछ, बादलों से धूप चटखेगी,
बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते, मैंने देखा है

मुझे मालूम है उनकी दुआएँ साथ चलती हैं
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते, मैंने देखा है।

चार

झिलमिलाते हुए दिन रात हमारे लेकर
कौन आया है हथेली पे’ सितारे लेकर

हम उसे आँखों की देहरी नहीं चढ़ने देते
नींद आती न अगर ख़्वाब तुम्हारे लेकर

रात लाई है सितारों से सजी कंदीलें
सरनिगूँ¹ दिन है धनक वाले नज़ारे लेकर

एक उम्मीद बड़ी दूर तलक जाती है
तेरी आवाज़ के ख़ामोश इशारे लेकर

रात, शबनम से भिगो देती है चहरा-चहरा
दिन चला आता है आँखों में शरारे लेकर

एक दिन उसने मुझे पाक नज़र से चूमा
उम्र भर चलना पड़ा मुझको सहारे लेकर।
( 1- नतमस्तक )


पाँच

तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक
मेरी तो निगाहें हैं, सूरज के ठिकानों तक

टूटे हुए ख़्वाबों की इक लम्बी कहानी है
शीशे की हवेली से, पत्थर के मकानों तक

दिल आम नहीं करता, एहसास की ख़ुशबू को
बेकार ही लाये हम चाहत को जुबानों तक

लोबान का सौंधापन, चंदन की महक में है
मंदिर का तरन्नुम है, मस्जिद की अज़ानों तक

इक ऐसी अदालत है, जो रूह परखती है
महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक

हर वक़्त फ़िजाओं में, महसूस करोगे तुम
मैं प्यार की ख़ुशबू हूँ, महकूँगा ज़मानों तक।


छह

अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा
आसूदगी¹ के नाम पे कुछ भी नही रहा

सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में
अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आई थी बाढ़ गाँव में, क्या-क्या न ले गई
अब तो किसी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

घर के बुजुर्ग लोगों की आँखें ही बुझ गईं
अब रौशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आए थे मीर ख़्वाब में कल डाँटकर गए-
‘क्या शायरी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा?’
(1-प्राप्तियाँ )

सात

बूढ़ा-टपरा, टूटा छप्पर और उस पर बरसातें, सच
उसने कैसे काटी होंगी, लम्बी-लम्बी रातें, सच

लफ़्जों की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या ?
मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें, सच

कच्चे-रिश्ते, बासी-चाहत और अधूरा-अपनापन
मेरे हिस्से में आईं हैं ऐसी ही सौगातें, सच

जानें क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते
पलकों से ही लौट गई हैं सपनों की बारातें, सच

धोका ख़ूब दिया है ख़ुद को झूठे-मूठे क़िस्सों से
याद मगर अब करने बैठे, याद आई हैं बातें सच।


आठ

मुद्दतों ख़ुद की कुछ ख़बर न लगे
कोई अच्छा भी इस क़दर न लगे

वो मेरा दोस्त भी है दुश्मन भी
बद्दुआ दूँ उसे मगर न लगे

मैं उसे पूजता तो हूँ लेकिन
चाहता हूँ उसे ख़बर न लगे

रास्ते में बहुत है सन्नाटा
मेरे महबूब तुझको डर न लगे

बस तुझे इस नज़र से देखा है
जिस नज़र से तुझे नज़र न लगे।


नौ

ज़रा पाने की चाहत में, बहुत कुछ छूट जाता है
नदी का साथ देता हूँ, समंदर रूठ जाता है

अजब शै हैं ये रिश्ते भी बहुत मज़बूत लगते हैं
ज़रा सी भूल से लेकिन, भरोसा टूट जाता है

तराजू के ये दो पलड़े कभी यकसाँ¹ नहीं होते
जो हिम्मत साथ देती है, मुकद्दर रूठ जाता है

गनीमत है नगर वालो, लुटेरों से लुटे हो तुम
हमें तो गाँव में अक्सर दरोगा लूट जाता है

गिले-शिकवे, गिले-शिकवे, गिले-शिकवे, गिले-शिकवे,
कभी मैं रूठ जाता हूँ, कभी वो रूठ जाता है

ब-मुश्किल हम मुहब्बत के दफ़ीने² खोज पाते हैं
मगर हर बार ये दौलत, सिकंदर लूट जाता है।
(1-बराबर, 2- गड़ा हुआ धन,ख़जाना)

दस

ले गया दिल में दबा कर राज़ कोई
पानियों पर लिख गया आवाज़ कोई

बाँध कर मेरे परों में मुश्किलें
हौसलों को दे गया परवाज़ कोई

नाम से जिसके मेरी पहचान है
मुझमें उस जैसा भी हो अंदाज़ कोई

जिसका तारा था वो आँखें सो गईं
अब नहीं करता मुझपे नाज़ कोई

रोज़ उसको ख़ुद के अंदर खोजना
रोज़ आना दिल से इक आवाज़ कोई।
00

आलोक श्रीवास्तव
30 दिसंबर 1971 को शाजापुर, मध्य प्रदेश में जन्म।
स्नातकोत्तर हिंदी तक शिक्षा।
शायरी, कथा-लेखन और समीक्षात्मक लेखन।
साहित्य की सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
कई संकलनों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विशेषांकों में रचनाएं प्रकाशित।

उर्दू के प्रतिष्ठित शायरों की काव्य-पुस्तकों का सम्पादन।
‘अक्षरपर्व’ मासिक के विशेषांक 2000 और 2002 का अतिथि-सम्पादन।

फिल्म और टी वी के लिए गीत और कथा लेखन।
मशहूर गायकों द्वारा गीत और ग़ज़ल गायन।
देश व विदेश के प्रतिष्ठित कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में शिरकत।

ग़ज़ल के लिए वर्ष 2002 का ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’।

दिल्ली में टी वी पत्रकारिता, न्यूज़ चैनल ‘आज तक’ में प्रोड्यूसर।
स्थायी निवास : 73, रामद्वारा, विदिशा (मध्य प्रदेश)
वर्तमान पता : वी-90, सेक्टर-12, नोएडा-201301(उत्तर प्रदेश)

फोन : 098990 33337
ई मेल : aalokansh@yahoo.com
Aalok.shrivastav@aajtak.com

शुभकामनाएं !


"वाटिका" के सभी पाठकों को

क्रिसमस और नव वर्ष 2009 की

हार्दिक शुभकामनाएं !

शनिवार, १६ अगस्त २००८

दस कविताएं - रंजना श्रीवास्तव

इस पोस्ट के सभी चित्र : अवधेश मिश्र

1
ईश्वर की शर्त

वहाँ
एक आग थी
उसकी आँखों में
जहाँ धधकते थे दृश्य
और स्मृतियाँ
पछाड़ खाने के बावजूद
सूरज की लालटेन थामे
खड़ी थीं
रजस्वला हुई स्त्री की
शर्म से बेख़बर

अब वह ईश्वर के
बिल्कुल करीब थी
ईश्वर उदास था
क्योंकि वहाँ अब स्त्री नहीं थी

स्त्री होने के लिए
पानी हो जाना
ईश्वर की पहली शर्त थी।

2
ईश्वर नाराज है

वह पानी होने की
तमाम शर्तों के खिलाफ़ है
ईश्वर नाराज है
वह अपनी रफ़्तार से
दौड़ते हुए
हवा बन जाना चाहती है

धूप से चाहती है
अपने हिस्से की रोशनी
और ईश्वर से न्याय

नैतिकता की कोख से
जन्म लेकर
अनैतिक हुए ईश्वर के लिए
उसकी संवेदनाएं
नहीं छटपटातीं

वह आग के चरित्र से पूछती है
स्त्री होने के सवाल
धुआँ छटपटाता है
अपनी पीड़ाओं के
अंतिम छोर तक

आग के पास
मौन के सिवा
कुछ भी नहीं
वह जानती है…

3
मायूसियों के फूल

दु:ख जितने हरे होंगे
खिलेंगे मायूसियों के फूल

उदासी के रंगों की महक
देर तक बसी रहती है
मन-प्राणों में
बिछोह की आत्मीयता से
गले मिलते हुए सुना है कभी
साँसों की गहरी
अनुभूतियों का विलाप

समय के आइने में झांक कर देखो
सुखों की अनगिन आकृतियों के बीच
छिपी है जो
एक गहरी मुस्कान वाली परछाईं
वह तुम्हारे प्राणों पर
छाया रहने वाला सबसे कमनीय
दु:ख ही तो है।

4
मिठास के लिए ज़रूरी नहीं होता

हवा की हथेली पर
तैरते हैं सपने
वह नींद में गुनगुनाती है कोई गीत
उसकी झरने-सी हँसी
नींद के झरोखों से
खिलखिलाती है

गलती से
खुला रह गया है पिंजरा
आसमान उसकी मुटठी में है
वह रोटियों की चर्चा करते हुए
नमक के स्वाद के आख्यान में
उलझ जाती है
मिठास के लिए
ज़रूरी नहीं होता
हमेशा तैरने का सुख
अँधेरी कोठरी में भी
सूरज उगता है कभी-कभी
वह डूबने के सुख को
पीती है बूँद-बूँद

उसके चारों ओर प्रेम की
नदी बह रही है
उसे लग रहा है
वह धरती की
सबसे सुखी स्त्री है।

5
गृहस्थी

सुखों के अनगिन दृश्यों से
सजी हुई है गृहस्थी
एक खूबसूरत
पेटिंग की तरह

निर्जीव होते हुए
सजीवता से बेहद करीब
हँसी के निर्मल झरने
बहते रहते हैं रात-दिन
कितनी रंगीन शामों का
इतिहास जज्ब है
काल की दबी हुई परतों के बीच
बेहद उदास सी
टहल रही हैं
सन्नाटे की स्याह
घाटियों में
जिन्हें कोई नहीं देख पा रहा है

कितनी चीखें
अपनी कराह दबाये
सिसकियों के गहरे कुंड में
डूब जाना चाहती हैं

सबके चेहरे चमक रहे हैं
सब एक-दूसरे का रख रहे हैं ख्याल
कोई नहीं कह सकता
यहाँ दु:ख के लिए
कोई जगह बची है

पानी की तरह
बह रहा है जीवन
खुशी तैर रही है
जिस पर
कोमल और नर्म
पत्ते की तरह

रिक्त कोष्ठों के
भारी किवाड़ के पीछे
हवा सहमी-सी खड़ी है
बारिश अभी थमी हुई है
कुछ देर के लिए।

6
तुम्हारी दिव्यताओं में

मेरे हिस्से में
जैसे ठहरे हो तुम
तुम्हारे हिस्से
नहीं हूँ मैं

अबूझ है बूझे गए
मन का रहस्य
एक नाम, एक दृष्टि, एक देह
बस इतना-सा परिचय
एक चमक
जो छूकर निकल जाती है
तुम्हारी वासना की ओर

एक दृश्य
जो धुंधलाते बिम्बों का संग्रह
तुम्हारे अतीत के वैभव में
मेरी आत्मा का
निर्वसन होते जाना
तुम्हारे प्राणों से
फिसल जाना
मेरी अनुदार साँसों का

मैं एक धूप टुकड़ों में
बँटी हुई
एक काग़ज़
गलती हुई तुम्हारे पानी में
तुम्हारी दिव्यताओं में
मेरी लघुताओं का
प्रहसन हो जैसे

मैं कहीं नहीं
तुम्हारे शब्दों
तुम्हारी आत्मा के पार
विकर्षण के
पिघलते पहाड़ों से निर्मित
एक चट्टानी नदी
एक लहर
जिस पर खेलती है आग।

7
जीवन दुर्गम समीकरणों में

हम जीते हैं
अलग-अलग चेहरों के साथ
भीतर और बाहर में

एक चेहरा जब
हँस रहा होता है
उसके भीतरी सतह को
छू रही होती है कोई आग

किसी चेहरे की मद्धिम हँसी में
उसके भीतर के घाव पिघलकर
आँसू बन जाना चाहते हैं

जब कोई कह रहा होता है
कि उस पर भरोसा करें
उसके भीतर के घटित से
सर्वथा अनभिज्ञ और अनजान
होते हैं आप

संभव है
किसी चेहरे के ऊपर
छायी कठोरता में
नर्म गरमाहट वाली खुशबू
आपको अपनी अंतरंगता से
सराबोर कर दे

ऐसे ही किसी स्याह रातों में
कोई हमदर्दी भरा चेहरा
चुरा सकता है
आपकी स्वायत्तता का
सबसे प्रागैतिहासिक क्षण

और जिसे आप
अपने तजुर्बों की पंक्ति में
अपनी बिरादरी से
बहिष्कृत कर देते हैं
वही हो सकता है आपका
सबसे सगा और आत्मीय

जीवन के
दुर्गम समीकरणों में
सबसे जटिल है मनुष्य
वह अपने आप को
बेहतर ढंग से
छिपा सकता है
और छीन सकता है
औरों के चेहरे की धूप

सभ्यता की नई रोशनी में
चेहरों की हैसियत पर
उंगलियाँ उठाने में
बदनाम हैं जो लोग
उन्हें बख़्श दिया जाए
पूरी क्षमाशीलता के साथ
क्योंकि युग की आहट को
वे नहीं पहचानते

फूल के जंगल हो जाने पर
तितलियाँ कहाँ जाएंगी
निरर्थक प्रश्न है
धूप की चिन्गारियाँ
बर्फ़ में तब्दील हो रही हैं
बारिश की सूनी आँखों में
उग रही है प्यास।

8
दीवारें कितना भी बोलें

कई-कई नैतिकताओं की
दीवारें फांदकर
जन्म लेता है प्रेम
और तुम उसे
संस्कारों के घने कोहरे में
गुम होने से
बचाए रखना चाहते हो
दीवारें कितना भी बोलें
तुम अपने होने को
परिभाषित करते हुए
प्रेम के घने वृक्ष के नीचे
प्रकृति-प्रांगण में
छोड़ देते हो
देह और मन को निर्बन्ध

तभी चेतना की महीन परत को
चीर पैदा होता है
एक थरथराता हुआ सुख
जिसमें दुनिया की
तमाम सभ्यताओं की कंदीलें
एक साथ भक्क से जल उठती हैं

रोशनी और सुगन्ध के
धुएं से सराबोर
इस लम्हें में
तुम्हारे अस्तित्व का आदिम-सुख
तुम्हारी प्राणवायु के आलिंगन से
जान लेता है
अस्मिताओं के वर्चस्व की
रहस्यमयी गाथावलियाँ

इतिहास की पगडंडी पर
भविष्य के सपने के बीच
वर्तमान के इस अंतरंग पुल से
गुजरते हुए
मनुष्यता के किले में
तुम्हारे प्रवेश पर
चकित है
तुम्हारे ही भीतर का
वह अनचीन्हा आदमी
जिससे पहलीबार
मिल रहे होते हो तुम।

9
जहाँ जीवन सुगबुगाता है

छूट जाने का अहसास जब भी होता है
पकड़ती हूँ – छायाओं, दृश्यों व बिम्बों को
जहाँ जीवन सुगबुगाता है
अनास्था के काग़ज़ पर
आस्था के गीत लिख
तुम्हें गुनगुनाते हुए
रोपती हूँ तुममें ईश्वर
वहीं, जहाँ से शून्य की नदी बहती है
और सिफ़र की उदास वारदातें
अपनी हथेलियों पर
सरसों की तरह
डगराती हैं मुझे

तुम्हारा अपने आप में
मुझे छींट लेना
बो देना
गीली मिट्टी की सोंधी
महक में
और उगा लेना फिर से

अद्भुत है मेरा
पुनर्जन्म में प्रवेश
कामना के कैलाश शिखरों पर
मेरे प्राणों को
अपनी अंजुरी में रोंपते हुए
बूंद-बूंद सोखना
निर्बाध, नि:संकोच

मेरे आरम्भ !
तुममें ही विलय हैं
मेरी समस्त
गंगा-यमुनाएं !

10
पिता परंपरा थे

पिता परंपरा थे
उस परंपरा की लीक पर चलना
माँ की नैतिक जिम्मेदारी थी
ठीक वैसे ही
जैसे आग की कथा में
आग की नीतियों की बजाय
उसके जलने के स्वभाव पर
टिका होता है आग का भविष्य

पिता तय करते थे
माँ के हिस्से की रोशनी
और धुएं का वजूद
और माँ घने अंधेरे में
गुम हो जाती थीं

घर के लिए
जब भी कोई मानदंड
पिता द्वारा तय किया जाता था
माँ हमेशा पिता के पक्ष में होती थीं
पिता के पक्ष में
होते हुए भी उनके प्रतिपक्ष में
पैदा कर लेती थीं आवाज़ें

आवाज़ें बोलती थीं
माँ के मौन के गहरे समंदर में
अलग-अलग आवाज़ों के
अलग-अलग वजूद से
लिपटा था माँ का समय

माँ की अंतरंग दुनिया में
आवाज़ों से प्रतिध्वनित
शब्दों और रंगों का
एक बड़ा-सा तहखाना था
माँ का सूरज वहीं उगता था
पिता को माँ के हिस्से का
अंधेरा पसंद था
इसलिए माँ छिपा लेती थी
उनसे
अपने हिस्से की रोशनी।
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रंजना श्रीवास्तव
शिक्षा : एम ए, बी एड ।
जन्म : गाज़ीपुर(उत्तर प्रदेश)
प्रकाशित पुस्तकें : ‘चाहत धूप के टुकड़े की’, ‘सक्षम थीं लालटेनें’(कविता संग्रह), ‘आईना-ए-रूह’(ग़ज़ल संग्रह)

संपादन : ‘सृजन-पथ’(साहित्यिक पत्रिका)

पूर्वांचल की अनेक साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध। हिन्दी की प्रतिष्ठित लघु पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियाँ, समीक्षाएं एवं स्त्री विषयक लेख प्रकाशित।
सम्मान : ‘चाहत धूप के टुकड़े की’ कविता संग्रह पर सिलीगुड़ी गौरव सम्मान, उत्तर बंग नाट्य जगत से विशिष्ट कविता लेखन के लिए सम्मानित। हल्का-ए-तामीर-ए-अदब(मऊ आइमा), इलाहाबाद से महती सेवाओं हेतु प्रशस्ति पत्र।
संपर्क : श्रीपल्ली, लेन नंबर 2, पी ओ – सिलीगुड़ी बाज़ार, जिला- सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)-734 005

फोन : 09933946886
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