रविवार, 28 फ़रवरी 2010

वाटिका - फरवरी 2010


“वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत कलसी ‘हकीर’, सुरेश यादव, कात्यायनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव की कविताएं, और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र शजर, अनिल मीत और शेरजंग गर्ग की ग़जलें पढ़ चुके हैं। इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं- समकालीन हिंदी कविता में सुपरिचित कवयित्री इला प्रसाद की दस चुनिन्दा कविताएं… होली 2010 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…



दस कविताएँ - इला प्रसाद

॥ एक ॥
जाड़े की धूप

आती है देर से
भागती है जल्दी
बहुत कामचोर
हो गई है लड़की !


॥ दो ॥
दीमक

वक्त की दीमक
मेरे अक्षरों को चाट जाए
इससे पहले ही
दिखा देनी होगी इन्हें
दोपहर की धूप।

सीख लें ये भी
आँच में तपना
वक्त की कसौटी पर चढ़कर
खरा उतरना
धूप में चमकना
किसी के हिस्से का सूरज बनकर
राह में
रोशनी सा बरसना।

वक्त की दीमक
मेरे अक्षरों को लगे
इससे पहले ही
मैं दिखला जाऊँगी इन्हें
सुबह की धूप !

॥तीन॥
स्त्री

कच्चे भुट्टे के दानों-सी बिखरी
तुम्हारी वह उजली हँसी
लोगों की याद का
हिस्सा बन चुकी है
अपनी खुशबू के साथ।

वक्त ने चाहे
तुम्हारे होंठ सिल दिए हों
तुम्हारी हँसी के हस्ताक्षर
अब भी ज़िन्दगी की किताब के
पिछले पन्नों में बन्द हैं।

अगले पन्नों पर 'खामोशी' लिखते हुए
चाहे फिलहाल
तुम्हें पीछे देखने की इजाज़त न हो
समय का सूरज
ज़रूर लौटा लाएगा
तुम्हारे हिस्से की धूप
एक न एक दिन।

शायद तब
जब सुलगती उंगलियों से
आख़िरी पन्नों पर
तुम आग उगल रही होगी
क्योंकि आग, ख़ामोशी, धूप और खिलखिलाहट
औरत की ज़िन्दगी का सारा जोड़-घटाव है
जिसका उत्तर कभी भी 'शून्य' नहीं आता।

॥चार॥
द्वीप

आस्था की नदी में
विश्वास का द्वीप था
उसी द्वीप पर तो मैं
चुनौती देती निगाहों को
निरस्त करती
अकेली खड़ी थी !

॥पाँच॥
कविता

आज फिर मैंने तुम्हारा नाम लिया
आज फिर मैंने किसी से तुम्हारी बात की।

आज फिर मैंने किसी को प्यार से सहलाया
किसी को अपनी उजली हँसी से नहलाया
कोई मेरे करीब आया
मैं किसी के पास थी।

यह कैसा वक्फ़ा था
जो मेरे और कविता के बीच में आया
तुम्हारा मेरे क़रीब होना
एक कविता-सी ही तो बात थी !

॥छह॥
एक दोस्त के लिए

स्नेह यदि सम्बोधित होता है स्पर्शों से
स्पर्शों की यदि कोई भाषा होती है
तो शब्दों को अनुपस्थित ही रहने दो।

अनुभूतियों की कोई ज़मीन होगी
एहसासों का कोई मकान होगा
इन अनकहे अनुभवों को
उसी ज़मीन पर, उसी मकान में बसने दो।

स्मृतियों की एक किताब होगी
जो तुम्हारे भी पास होगी
इन कोमल नेह पंखुरियों को
उसी किताब में झरने दो।

ताकि किन्हीं बोझिल पलों में
जब भी किताब खुले
स्नेह का सुवास
तुम्हारे आसपास
घुले !

॥सात॥
अस्वीकृति

मैं तलछट-सी निकालकर
फेंक दी गई हूँ
किनारे पर
लहरों को मेरा
साथ बहना
रास नहीं आया।

मैं न शंख थी
न सीपी
कि चुन ली गई होती
किन्हीं उत्सुक निगाहों से
रेत थी
रेत-सी रौंदी गई
काल के क्रूर हाथों से।

॥आठ॥
लड़कियों से

मत रहो घर के अन्दर
सिर्फ़ इसलिए
कि सड़क पर ख़तरे बहुत हैं।

चारदीवारियाँ निश्चित करने लगें जब
तुम्हारे व्यक्तित्व की परिभाषाएँ
तो डरो।

खो जाएगी तुम्हारी पहचान
अँधेरे में
तुम्हारी क्षमताओं का विस्तार बाधित होगा
डरो ।

सड़क पर आने से मत डरो
मत डरो कि वहाँ
कोई छत नहीं है सिर पर।

तुमने क्या महसूसा नहीं अब तक
कि अपराध और अँधेरे का गणित
एक होता है ?
और अँधेरा घर के अन्दर भी
कुछ कम नहीं हैं

डरना ही है तो अँधेरे से डरो
घर के अन्दर रहकर
घर का अँधेरा
बनने से डरो !

॥नौ॥
सम्बन्ध

सम्बन्धों को उन्होंने ओढ़ा था
शॉल की तरह
ताकि वक्त ज़रूरत उन्हें
उतार दें गर्मियों में
और उम्मीद की मुझसे
कि मैं उनसे चिपकी रहूँ
जाड़ों में स्वेटर की तरह।

मासूम हैं लोग
नहीं समझते
कि न शॉल, न स्वेटर
रास आता है मुझे
मुझे तो ठिठुरती ठंड में
अपनी हड्डियों का
कड़ा होते जाना अच्छा लगता है।

॥दस॥
अगरबत्ती

अन्दर की आँच
अधिक तो नहीं थी
बस एक जलती हुई अगरबत्ती थी
जो धीमे-धीमे सुलगती रही
अलक्षित
और एक दुनिया अन्दर ही अन्दर
जल कर राख हो गयी।

अपने अन्दर की आग से
अगरबत्ती की राख से
फिर से उठी मैं
अगरबत्ती बन कर
और फिर से तपने लगी।
00

झारखंड
की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।
कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।
"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल आदि तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।
कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) । एक कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य्।
सम्प्रति :स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : ILA PRASAD
12934, MEADOW RUN
HOUSTON, TX-77066
USA
ई मेल : ila_prasad1@yahoo.com

11 टिप्‍पणियां:

अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा…

आती है देर से
भागती है जल्दी
बहुत कामचोर
हो गई है लड़की
बधाई इस सुन्दर कविता के लिए, सभी कविताएं एक पर एक होली सार्थक, मंगलमय...आप एवं सुभाष दा को...

सुरेश यादव ने कहा…

इला प्रसाद जी की कवितायेँ सुन्दर हैं. व्यापक मानवीय दृष्टि भी है और जीवन का संघर्ष भी है.संवेदनाओं से भरी ये कवितायेँ प्रशंशा के योग्य हैं बधाई.नीरव जी को इनके प्रकाशन के लिए धन्यवाद.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

बहुत सुन्दर कविताएं सुभाष. इला जी की इन कविताओं को प्रकाशित करने के लिए तुम्हें साधुवाद.

चन्देल

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

क्योंकि आग, ख़ामोशी, धूप और खिलखिलाहट
औरत की ज़िन्दगी का सारा जोड़-घटाव है
जिसका उत्तर कभी भी 'शून्य' नहीं आता।

Amazing kavita sankalan...sabhee rachnayen arthpurn,dil kee gahrayii se ukeri huyi

Thanks for sharing !

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

भवप्रवण कविताएं हैं.

प्रदीप कांत ने कहा…

आती है देर से
भागती है जल्दी
बहुत कामचोर
हो गई है लड़की !

अच्छी कविताएँ

devmani pandey ने कहा…

सोच, संवेदना और ताज़गी से भरपूर इलाजी की कविताएं अच्छी लगीं। कविता कम शब्दों में ज़्यादा बात कहने कि कला है,इलाजी ने इसे साबित कर दिया है।

देवमणि पाण्डेय (मुम्बई)

निर्मला कपिला ने कहा…

इला प्रसाद की सभी रचनायें बहुत अच्छी लगी धन्यवाद।

Amit Kumar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति....बधाई !!
______________
सामुदायिक ब्लॉग "ताका-झांकी" (http://tak-jhank.blogspot.com)पर आपका स्वागत है. आप भी इस पर लिख सकते हैं.

सुधाकल्प ने कहा…

इलाजी की कविताओं में ,संवेदना .,भावना का स्फुरण अति सुन्दर है I बधाई है I
सुधा भार्गव

ओमप्रकाश यती ने कहा…

इला जी की कविताएँ भावपूर्ण एवं मर्मस्पर्शी हैं ....साधुवाद.