रविवार, 2 जनवरी 2011

वाटिका - जनवरी 2011



“वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत ‘हीर’, सुरेश यादव, कात्यायनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव, इला प्रसाद की कविताएं और राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र शजर, अनिल मीत, शेरजंग गर्ग, लता हया, ओमप्रकाश यती, रंजना श्रीवास्तव और नरेश शांडिल्य ग़जलें पढ़ चुके हैं। जनवरी 2011 से ‘वाटिका’ में हल्का-सा परिवर्तन किया जा रहा है। इस अंक से हम ‘दस कविताओं या दस ग़ज़लों’ की अनिवार्यता को खत्म कर रहे हैं। मकसद कवि की अच्छी कविताओं को कविता प्रेमियों के सम्मुख रखना है, भले ही वे गिनती में पाँच हों, छ्ह हों अथव सात। यानि अधिक से अधिक सात कविताएं अथवा ग़ज़लें। वर्ष 2011 के जनवरी अंक में हम कवयित्री जेन्नी शबनम की सात कविताएँ प्रस्तुत कर रहे हैं…

आप सभी को नव वर्ष 2011 की अनेक शुभकामनाएं !
सुभाष नीरव


जेन्नी शबनम की सात कविताएँ


दंभ हर बार टूटा...

रिश्ते बँध नहीं सकते
जैसे वक़्त नहीं बंधता,
पर रिश्ते रुक सकते हैं
वक़्त नहीं रुकता !
फिर भी कुछ तो
है समानता,
न दिखे पर दोनों
साथ है चलता !
नहीं मालूम
दूरी बढ़ी
या कि
फासला न मिटा,
पर कुछ तो है कि
साथ होने का दंभ
हर बार टूटा !
-0-

मन भी झुलस जाता है...

मेरे इंतज़ार की
इन्तहाँ देखते हो,
या कि अपनी बेरुखी से
ख़ुद खौफ़ खाते हो !
नहीं मालुम क्यों हुआ
पर कुछ तो हुआ है,
बिना चले हीं कदम
थम कैसे गए?
क्यों न दी आवाज़ तुमने?
हर बार लौटने की
क्या मेरी ही बारी है?

बार-बार वापसी
नहीं है मुमकिन,
जब टूट जाता है बंधन
फिर रूठ जाता है मन !
पर इतना अब मान लो
इंतज़ार हो कि वापसी
जलते सिर्फ पाँव हीं नहीं
मन भी झुलस जाता है !
-0-

मेरी दुनिया...

यथार्थ से परे
स्वप्न से दूर,
क्या कोई दुनिया होती?
शायद मेरी दुनिया ऐसी हीं होती !
एक भ्रम...अपनों का...
एक भ्रम... जीने का...
कुछ खोने और पाने का...
विफलताओं में आस बनाये रखने का...
नितांत अकेली मगर भीड़ में खोने का...!!!
पर ये लाज़िमी है मेरे लिए,
ऐसी दुनिया न बनाऊं तो जियूं कैसे?
-0-

रचती हूँ अपनी कविता...

दर्द का आलम
यूँ हीं
नहीं होता
लिखना,
ज़ख़्म को
नासूर बना

होता है
दर्द जीना,
कैसे कहूँ
कि कब
किसके दर्द को
जिया,
या अपने हीं
ज़ख़्म को
छील
नासूर बनाया,
ज़िन्दगी हो
या कि
मन की
परम अवस्था,
स्वयं में
पूर्ण समा
फिर रचती हूँ
अपनी कविता ।
-0-

ज़िन्दगी मौका नहीं देती...

खौफ़ के साये में
ज़िन्दगी को तलाशती हूँ,
ढेरों सवाल हैं
पर जवाब नहीं
हर पल हर लम्हा
एक इम्तहान से गुजरती हूँ,
ख्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख्त,ये जिंदगी मौका नहीं देती ।
-0-

इक दर्द पिघलता

मेरी नसों में लहू बनकर
इक दर्द पिघलता है,
मेरी साँसों में ख़ुमार बनकर
इक ज़ख्म उतरता है,
इक ठंढी आग है
समाती है सीने में मेरे धीरे -धीरे,
और उसकी लपटें
जलाती है ज़िन्दगी मेरी धीमे- धीमे
न राख है ,न चिंगारी
पर ज़िन्दगी है कि
सुलगती ही रहती है ।
-0-

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के,
रेहन रख आई हूँ,
ख़ुद को, बचा लाई हूँ ।

साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको,
लो, सँभाल लो अब,
ख़ुद को, जितना बचा पाई हूँ ।
-0-

डॉ. जेन्नी शबनम
जन्म : 16 नवंबर 1966, भागलपुर (बिहार)
शिक्षा : एम.ए., एल.एलबी.,पी.एच.डी.
संप्रति : अधिवक्ता, नई दिल्ली
ब्लॉग : http://lamhon-ka-safar.blogspot.com
ई मेल : jenny.shabnam@gmail.com

14 टिप्‍पणियां:

Sankalp ने कहा…

जेन्नी जी,

आपको पढ़ना हमेशा ही एक विशेष अनुभव रहा है... भावनाओं और रोमांच से भरपूर...

बहुत ही खूबसूरत रचनायें हैं। हार्दिक बधाइयां स्वीकार करें...

संकल्प

mridula pradhan ने कहा…

bahot khoobsurat likhtin hain aap.

जेन्नी शबनम ने कहा…

@ kamboj bhaai sahab,
mujhe aur meri rachna ko maan dene keliye mann se aabhaari hun. yun hin sneh aur aashish kee apeksha aapse sada rahegi. bahut shukriya.

@ subhash ji,
tahedil se aapka shukriya, mujhe yahan sthaan dene keliye.

जेन्नी शबनम ने कहा…

@ kamboj bhaisahab,
aapka bahut bahut aabhar jo mujhe aur meri rachna ko maan dete hain. sadaiv yun hin sneh aur aashish kee apeksha rahegi. saadar...

@ subhash neerav ji,
aapne meri rachna ko yahan sthaan dekar jo samman diya hai aabhari hun. mann se shukriya.

manukavya ने कहा…

आदरणीय रामेश्वर जी, धन्यवाद आपने इतनी सुन्दर रचनाएँ पढ़ने का अवसर उपलब्ध कराया. जेन्नी जी की रचनाएँ पहली बार पढ़ीं और पढ़ कर मुग्ध हो गयी.

क्यों न दी आवाज़ तुमने?
हर बार लौटने की
क्या मेरी ही बारी है?
एक मासूम सा सवाल, जो सवाल कम मनुहार जादा लगता है..

यथार्थ से परे
स्वप्न से दूर
ऐसी दुनिया न बनाऊं तो जियूं कैसे?

एक सवाल जो टीस की तरह चुभता है

कैसे कहूँ
कि कब
किसके दर्द को
जिया,
या अपने हीं
ज़ख़्म को
छील
नासूर बनाया,

दर्द को जीने का एक ऐसा एहसास जो ये पंक्तियाँ पढ़ कर कोई भी बिना महसूस किये नहीं रह सकता


ख्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख्त,ये जिंदगी मौका नहीं देती ।

ये पंक्तियाँ तो बस मन में घर ही कर गयीं.


न राख है ,न चिंगारी
पर ज़िन्दगी है कि
सुलगती ही रहती है

ज़िंदगी ऐसी ही है...

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के,
रेहन रख आई हूँ,
ख़ुद को, बचा लाई हूँ

कुछ टुकड़े अतीत के रेहन रख कर खुद को बचा लेने का ख़याल अपने आप में बेमिसाल है.

मंजु

rachana ने कहा…

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के,
रेहन रख आई हूँ,
ख़ुद को, बचा लाई हूँ
kya khoob likha hai
क्यों न दी आवाज़ तुमने?
हर बार लौटने की
क्या मेरी ही बारी है?
sahi kaha hai .pr hota to yahi hai
bahut sunder sabhi kavitayen
aap ko badhai
rachana

Dr.Bhawna ने कहा…

Sabhi rachnayen dil par amit chaap jhodti han bahut2 badhai...

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

जेन्नी जी की सभी कविताएँ मन को छू गईं ।
हर पल हर लम्हा
एक इम्तहान से गुजरती हूँ,
ख्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख्त,ये जिंदगी मौका नहीं देती....
वाह ! इन पंक्तियों का तो कोई जवाब ही नहीं !
जेन्नी शबनम को पढ़ना बहुत ही अच्छा लगा !

सहज साहित्य ने कहा…

जेन्नी शबनम जी की कविताओं का अन्दाज़ एकदम अछूताआउर हृदयस्पर्शी है। हर कविता जीवन के गहन अनुभूत क्षणों को रूपायित करती है ।

निर्मला कपिला ने कहा…

जेन्नी जी की सभी कवितायें भावनाओं से ओतप्रोत और हृद्यस्पर्षी हैं। धन्यवाद उन्हें पढवाने के लिये।

प्रदीप कांत ने कहा…

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के,
रेहन रख आई हूँ,
ख़ुद को, बचा लाई हूँ ।

साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको,
लो, सँभाल लो अब,
ख़ुद को, जितना बचा पाई हूँ ।
-0-

मानवीय संवेदनाओं की कविताएँ

ओमप्रकाश यती ने कहा…

जेन्नी जी की कविताएं अत्यंत मर्मस्पर्शी और सक्षम हैं...साधुवाद... ओमप्रकाश यती

KAHI UNKAHI ने कहा…

कुछ टुकड़े हैं, अतीत के,
रेहन रख आई हूँ,
ख़ुद को, बचा लाई हूँ ।

साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको,
लो, सँभाल लो अब,
ख़ुद को, जितना बचा पाई हूँ ।


वाह! क्या खूब!
बस निःशब्द हूँ...।

प्रियंका

Madhu Rani ने कहा…

जेन्नी, तुम्हारी सारी रचनाएं मुझे बहुत पसंद हैं। परंतु ये सातों कविताएं​ तो दिल में ही उतर गईं। बहुत बहुत बधाई।