मंगलवार, 24 मई 2011

वाटिका – मई 2011







“वाटिका” – समकालीन कविता के इस उपवन में भ्रमण करते हुए अभी तक आप अनामिका, भगवत रावत, अलका सिन्हा, रंजना श्रीवास्तव, हरकीरत ‘हीर’, सुरेश यादव, कात्यायनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव, इला प्रसाद और जेन्नी शबनम की कविताएं तथा राजेश रेड्डी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रामकुमार कृषक, आलोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र शजर, अनिल मीत, शेरजंग गर्ग, लता हया, ओमप्रकाश यती, रंजना श्रीवास्तव और नरेश शांडिल्य ग़ज़लें पढ़ चुके हैं। ‘वाटिका’ के मई 2011 के अंक में इस बार उर्दू-हिंदी के जाने माने कवि नोमान शौक की दस कविताएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है, आप इन्हें पसन्द करेंगे और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएँगे…
-सुभाष नीरव



नोमान शौक़ की कविताएँ

हमेशा के लिए

निकल जाते हैं सपने
किसी अनन्त यात्रा पर
बार-बार की यातना से तंग आकर

गीली आँखें
बार-बार पोंछी जाएं
सख्त हथेलियों से
तो चेहरे पर ख़राशें पड़ जाती हैं
हमेशा के लिए !
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यातना

बुझती हुई सिगरेट
देर तक दबी रहे उंगलियों में
तो जला डालती है
स्पर्श की संवेदना

मृत शरीर
कितने ही प्रिय व्यक्ति का क्यों न हो
बदबू देने लगता है
थोड़े समय बाद

किसी टूटे हुए रिश्ते को
अन्तिम सांस तक संभाल कर
जीने की चाह से
बड़ी नहीं होती
कोई यातना ।



उन्हें ऐतराज़ है

वे कहते हैं
वसंत रुक क्यों नहीं जाता
उनके गमले में उगे पौधों पर
ठहर क्यों नहीं जाता
हमेशा के लिए पानी
गांव के तालाब में
धरती पर गिर कर
क्यों खाद में तब्दील हो जाते हैं
पलाश के फूल
क्यों छोड़ जाती हैं
अमावस के पदचिन्ह
चांदनी रातें उनकी खिड़कियों पर
सुरा और सुन्दरी के बीच रहकर भी
क्यों बूढे हो जाते हैं वे
उन्हें ऐतराज़ है !

उन्हें ऐतराज़ है
आख़िर घूमती क्यों है पृथ्वी !
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उसे मालूम है

उसे मालूम है
किस रात की
क्या उम्र होती है

उसे मालूम है
कितना अंधेरा हो
तो दीपक राग गाते हैं

उसे मालूम है
कितनी उदासी हो
तो कितना मुस्कुराते हैं

उसे मालूम है
किस गीत का मुखड़ा
मैं उसकी शक्ल को देखे बिना
सोच भी सकता नहीं

मगर जब भी
वो मेरी सिम्त आना चाहता है
जाने क्यों हर मरतबा
इक काली बिल्ली
उसका रस्ता काट जाती है !
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इंतज़ार

बारिश की गवाही में खिले
चाहत के फूल मुरझाने लगे
लहकते, महकते बाग़ीचों में
ज़र्द पत्तों की झांझनें बजने लगीं
नदी किनारे उगी सरकंडों की बाड़ से
पलायन कर गए मुर्गाबियों के झुंड

कितने ही स्वप्निल मौसमों की
रंगीन चादरें जलकर राख हो गईं

उम्र की रस्सी से
यह आख़िरी गांठ भी खोल दी मैंने
मगर तुम नहीं आए…



ख़ज़ाने पर

मैं ही हूँ
सबसे ज्यादा कंजूस
अपने दोस्तों में

बैठा रहता हूं आठों पहर
अपने दुखों के ख़ज़ाने पर
कुंडली मारे

नाग की तरह।
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ग्राउन्ड ज़ीरो

वहाँ भी होता है
एक रेगिस्तान
जहाँ किसी को दिखाई नहीं देती
उड़ती हुई रेत

वहाँ भी होता है
एक दर्द
जहाँ तलाश नहीं किये जा सकते
चोट के निशान

वहाँ भी होती है
एक रात
जहाँ जुर्म होता है
चांद की तरफ़ देखना भी

वहाँ भी होती है
एक रौशनी
जहाँ पाबंदी होती है
पतंगों के आत्मदाह पर

वहाँ भी होती है
एक दहशत
जहाँ अदब के साथ
क़ातिलों से इजाज़त मांगनी होती है
चीख़ने से पहले

वहाँ भी होता है
एक शोक
जहाँ मोमबत्तियां तक नहीं होतीं
मरने वालों की याद में जलने
या जलाने के लिए

वहाँ भी होता है
एक शून्य
जहाँ नहीं पहुंच पाते
टी. वी. के कैमरे।
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तनी हुई रस्सी पर

बार-बार रुक जाता हूं मैं
सन्तुलन बनाए रखने की चिन्ता में।

बहुत मुश्किल होता है
किसी बेनाम रिश्ते की तनी हुई रस्सी पर
चलते रहना सारी उम्र।



अजनबी



क्यों बोई गई है
हमारे ख़मीर में इतनी वहशत
कि हम इंतज़ार भी नहीं कर सकते
फ़लसफ़ों के पकने का

यहाँ क्यों उगती है
सिर्फ शक की नागफनी ही
दिलों के दरमियाँ

कौन बो देता है
हमारी ज़रख़ेज़ मिट्टी में
रोज़ एक नया ज़हर!

यक़ीन के अलबेले मौसम
तू मेरे शहर में क्यों नहीं आता!
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उम्र की तख्ती पर

एक बच्चे की गेंद की तरह
हाथ से फिसल कर
उछलती हुई
दूर-बहुत दूर चली गई दुनिया
और मैं!
उम्र की तख्ती पर लिखता रहा
सिर्फ़ दिन, महीने और साल!
000

नोमान शौक़
जन्म : आरा, बिहार में जन्म 02 जुलाई 1965
शिक्षा : स्नातकोत्तार अंग्रेज़ी और उर्दू
1981 से हिंदी एवं उर्दू में समान रुप से लेखन
'रात और विषकन्या' कविता संग्रह (ज्ञानपीठ द्वारा दूसरा संस्करण प्रकाशित) 'अजनबी साअतों के दरम्यान' (ग़ज़ल संग्रह)
'जलता शिकारा ढूंढने' में (ग़ज़ल संग्रह)
'फ़्रीज़र में रखी शाम'(कविता संग्रह)
कविताएं, ग़ज़लें, आलोचनात्मक लेख, समीक्षाएं और हिन्दी, उर्दू , फ़ारसी तथा अंग्रेज़ी से परस्पर अनुवाद विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
कई रचनाओं का अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद
संप्रति: आकाशवाणी, दिल्ली।
सम्पर्क: ए-501, प्रसार कुंज, सेक्टर पाई वन, ग्रेटर नोएडा-201306
कार्यालय: एफ़.एम.रेनबो,आकाशवाणी, संसदमार्ग,नई दिल्ली-110001
मोबाइल: 09810571659
ई मेल : nomaanshauque@gmail.com

33 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हर क्षणिका और रचना बेमिसाल ...

सुभाष नीरव ने कहा…

कथाकार बलराम अग्रवाल ने निम्नलिखित टिप्पणी मेल से भेजी है-

प्रिय सुभाष
टिप्पणी जा नहीं पा रही है इसलिए यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ।

मेरे जैसे लोग, जो कुछ नहीं पढ़ते, उन्हें हर नाम नया और अनजाना लगता है। नोमान शौक़ को लेकर भी यही सच है। लेकिन दाद देनी चाहिए तुम्हारी कि हीरे खोजकर(खोदकर नहीं)लाते हो। उनकी हर कविता पिछली से बेहतर नजर आई। 'उन्हें ऐतराज़ है' तो समूचे अभिजात्य-वर्ग की कलई खोल देने वाली अविस्मरणीय रचना है। उन्हें और तुम्हें दोनों को बधाई भी धन्यवाद भी।
-बलराम अग्रवाल

ashok andrey ने कहा…

priya bhai subhash jee bahut samay ke baad itni achchhi rachnaen padne ko milin noman shouk jee ki kavitaon ko pad kar achchha lagaa man ko chhu gaeen unki har kavita inhe padvane ke liye mai aapka aabhar vayakt karta hoon or namaan jee ko bhee badhai deta hoon.

शैल अग्रवाल ने कहा…

कविताओं की उदास बेबाकी और उलझन दोनों ही मन के बेहद करीब लगी। एक नम सा मूड बनाती कविताओं के लिए बधाई , बधाई इन अंतरंग और सुन्दर कविताओं की प्रस्तुति के लिए।

शैल अग्रवाल ने कहा…

कविताओं की बेबाक उदासी मन को छूती है। एक खास मूड बनाती सभी कविताएं अच्छी लगीं। बधाई सुन्दर और सशक्त प्रस्तुति के लिए।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

नोमान शौक़ साहब की सभी रचनाएं पढ़ी. बहुत उत्कृष्ट लेखनी है. प्रेम, पीड़ा, व्यथा, द्वन्द, दर्शन सभी कुछ शामिल है. बहुत संजीदगी और संवेदनशीलता है रचनाओं में...

''उम्र की रस्सी से
यह आख़िरी गांठ भी खोल दी मैंने
मगर तुम नहीं आए…''

''वहाँ भी होता है
एक दर्द
जहाँ तलाश नहीं किये जा सकते
चोट के निशान''

''बहुत मुश्किल होता है
किसी बेनाम रिश्ते की तनी हुई रस्सी पर
चलते रहना सारी उम्र।''

ऐसी उत्कृष्ट रचनाएं हम तक पहुंचाने केलिए सुभाष जी का धन्यवाद, नोमान साहब को बधाई!

सुभाष नीरव ने कहा…

नोमान जी की कविताओं पर देवी नांगरानी जी ने यह टिप्पणी मेल से भेजी है-

Manney Subash ji
Shri Nomman Shauk ji ki rachnaon se guzarte hue laga ki apne hi jiye hue kuch palon ke aks sammne aaue hain. ahsason ko shabdon mein sakar swaroop dene ki kalatmak abhivyakti padhwane ke liye dhanywaad
Devi Nangrani

shikha varshney ने कहा…

wow...ultimate poems.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

नोमान शौक जी को पढ़ना बहुत सुकून भरा है। पर यह सुकून अन्‍दर एक छटपटाहट भी देता है।

बेनामी ने कहा…

Namaskar !
Noman Shoq saheb ki kavitayen achhi lagi .
jivan ki vastvikta jhalakti hai ! badhai !
-Jyoti Kiran
kiranjyoti49@gmail.com

Patali-The-Village ने कहा…

हर क्षणिका और रचना बेमिसाल| धन्यवाद|

बेनामी ने कहा…

ताज़े फूल की भीनी खुशबू सी बिखेर गईं मन में नोमान जी की कवितायें ! उन्हें मेरा सलाम !
Rekha Maitra
rekha.maitra@gmail.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

anupama's sukrity ! ने कहा…

यक़ीन के अलबेले मौसम
तू मेरे शहर में क्यों नहीं आता!
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शहर से क्या ..दुनिया से ही गायब हो गया है ...!!
कभी दिख भी जाये तो उसे घेर लेंगे ...!!
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

सारी कविता कबीले तारीफ़ है ... खास कर मुझे "यातना" बहुत अच्छी लगी ...

ana ने कहा…

kamal ki kshanikaaye

prerna argal ने कहा…

main pahali baar aapke blog main aai hoon.aapki har rachanaa bemisaal hai.gaharai li hui saarthak rachanayen.badhaai aapko.



please visit my blog and free feel to comment.thanks

सदा ने कहा…

''वहाँ भी होता है
एक दर्द
जहाँ तलाश नहीं किये जा सकते
चोट के निशान''
सभी कविताएं एक से बढ़कर एक .. आपका बहुत -बहुत आभार इस प्रस्‍तुति के लिये ।

वन्दना ने कहा…

क्या कहूँ …………पढने के बाद खो गयी हूँ जब खुद को ढूँढ लूंगी तब ही कुछ कह पाऊँगी।

Anand Dwivedi ने कहा…

गीली आँखें
बार-बार पोंछी जाएं
सख्त हथेलियों से
तो चेहरे पर ख़राशें पड़ जाती हैं
हमेशा के लिए !..
..
कौन देखता है इन रेखाओं को...कोई भी तो कोई देखे या भाड़ में जाये जब वो नही देखता तब दर्द होता है.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

namaskaar !
behad hi sunder kavitae hai , jab ki chhoti kavitae bahut ahchci lagi .jab ki kavitapn me kai esi abhivyakti hai ki panktiyaan behad khoob surati se ubhaar kar aayi , aabhar in rachnaon ke liye .
sadhuwad
saadar

कुश्वंश ने कहा…

आपकी वाटिका में पहली बार आया, सुकून मिला नोमान जी को पढ़कर , बेमिसाल है उनकी काव्य धारा , आप भी कम बधाई के पात्र नहीं उत्क्रिता प्रस्तुतीकरण के लिए

Maheshwari kaneri ने कहा…

सारी कविताएँ बहुत सुन्दर…….आप की वाटिका में पहली बार आई बहुत अच्छा लगा धन्यवाद

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

गहन अनुभूतियाँ,भाव प्रवण क्षणिकाएं

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बेहतरीन रचनाएँ पढ़वाने के लिए नीरव जी का आभार!

Richa P Madhwani ने कहा…

बहुत मुश्किल होता है
किसी बेनाम रिश्ते की तनी हुई रस्सी पर
चलते रहना सारी उम्र।

khoobsurat akshar

http://shayaridays.blogspot.com

कुमुद अधिकारी ने कहा…

कविताएं दिल को छूते हुए निकल गई और एक निशां छोड़ गई। इन्हें अनुवाद कर अपनी साइट www.sahityasarita.net पर प्रकाशित करना चाहूँगा, नेपाली में। कृपया इजाजत प्रदान करें।

ghazalganga ने कहा…

बेमिसाल

---devendra gautam


please visit gazalganga.in

सुशील कुमार ने कहा…

नोमान शौक की कविताएँ पढ़कर कविता के पाठक को यह तसकीन होता है कि कविता भले ही छ्न्द से अलग हुई हो , पर अपनी लय और छांदस प्रकृति से नहीं। मुहावरे के नूतन और सटीक प्रयोग , साथ ही हिन्दी के साथ उर्दु लफ़्जों का आवश्कतानुसार मिश्रण कविताई-भाषा को काफी समृद्ध कर गया है जो कवि की वस्तुगत संवेदना को कविता के निहितार्थ गहराई प्रदान करने में सक्षम हुआ है। कवि अपनी प्रस्तुत कविताओं में अपनी आत्मा को टटोल करता दीखता है और सत्य के बेहद करीब आकर उसे शब्दों के हाथ से छूने की कोशिश करता है, उसकी यह खूबी पाठक में रचना के प्रति सम्मोहन पैदा करती है जो इन रचनाओं का पारितोषिक है और उसकी सफलता भी। हम कह सकते हैं कि नोमान शौक साहब की कविताएँ वर्तमान दौर की लगभग अराजक स्थिति से गुजर रही अधिकतर समकालीन हिन्दी कविताओं की जगह कविता में रुचि और अनुशासन उत्पन्न करने का सामर्थ्य रखती है क्योंकि उनके शब्द उनके जीवनानुभव और भाषाई लोच के तादात्म्य से पाठक के मन पर एक स्वाभाविक असर छोड़ती है। भाई सुभाष जी को ऐसे कवि को वाटिका में लाने के बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूँ।

श्रद्धा जैन ने कहा…

गीली आँखें
बार-बार पोंछी जाएं
सख्त हथेलियों से
तो चेहरे पर ख़राशें पड़ जाती हैं
हमेशा के लिए !
bahut gahri baat..

किसी टूटे हुए रिश्ते को
अन्तिम सांस तक संभाल कर
जीने की चाह से
बड़ी नहीं होती
कोई यातना ।
Atoot satay…

मगर जब भी
वो मेरी सिम्त आना चाहता है
जाने क्यों हर मरतबा
इक काली बिल्ली
उसका रस्ता काट जाती है !
Nishabd…. Karne wali kavita…

उम्र की रस्सी से
यह आख़िरी गांठ भी खोल दी मैंने
मगर तुम नहीं आए…
Waah waah.. kya kahun.. aapki kavitayen padhkar man jhoom utha..

बैठा रहता हूं आठों पहर
अपने दुखों के ख़ज़ाने पर
कुंडली मारे .. aha kya kanjoosi hai.. 

बहुत मुश्किल होता है
किसी बेनाम रिश्ते की तनी हुई रस्सी पर
चलते रहना सारी उम्र।
Bahut khoob..
बच्चे की गेंद.. duniya, .. umr ki takhti.. waah..

सुभाष जी बहुत-बहुत धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

nomaan shauq ji ki kavitaen parhkar man anandit ho utha. Maine unki ghazlein to bahut parhe hain prantu unki adbhut kavitaon ki kshamta se anbhigya tha. Krpya unse kuchh ghazlein bhi dene ka meri or se agrah karein.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई सुभाष,

देर से नोमान की कविताएं पढ़ने के लिए क्षमा. बहुत सुन्दर रचनाएं.

चन्देल

सुशील कुमार ने कहा…

विनीता जोशी की कविताओं में जीवन के प्रति रागात्मकता की सहज अभिव्यक्ति हुई है|जीवन के अस्तित्व को उन्होने कई चीजों से जोड़ कर देखा और मुर्त करने का प्रयास किया है | माँ इसमें अव्वल और प्राथमिक है|माँ की कोमल भावनाओं में तो सृष्टि का सातत्य गुप्त है और कवयित्री फिर कविता -यात्रा में गुजरते हुए में औरत के मन - विज्ञान तक पहुँचती है| भाषा भी भाव - सृजन के अनुरूप सहज , ग्राहय और शब्दों की अनुगामी प्रतीत होती है| कविता अपनी अर्थमयता से अधिक भावात्मकता की ओर झुकी हुई है जो कविता की प्राण है और जेहन में देर तक टिकती हैं| अंत तक आते-आते कविता में प्रेम का अदम्य रूप गोचर होता है जिसमें रीतपन और रीति-काल की उत्तेजना नहीं बल्कि अनूठा रूप और संभार है| सुभाष भाई को ऐसी उत्तम कवितायें पढ़वाने के लिए मैं अतिरिक्त आभारी हूँ |-
कल सुनना मुझे सुशील कुमार